गुजरे है हमने भी दिन इस ही गरोंदे में;
क्या बतायेगा कोई हमे, क्या छिपा है किस कोने में..
हर शक्स याद है हमे, रास्तें नहीं भूले है
खेले है हम भी, इस ही गली की किसी कोने में...
जलती जमीन पर नंगे पाओ भागते थे हम
चिप कर खाते थे, कुल्फी घर के उस कोने में ...
उन बड़ी इमारतों में चुप गया है घर मेरा,
पर आज भी उतना ही प्यार है, उसके हर कोने से....
वोह सुबह का सूरज , रात की चांदनी हमने भी देखि है
मगर लगता है आज चाँद की बेरुखी है शहर के एस कोने से ...
क्या बतायेगा कोई हमे, क्या छिपा है किस कोने में..