ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते ;
हर रोज़ तेरे कोठे पर आते, हर रोज़ तुझ से इश्क लड़ाते ....
तेरे हर थिरकते कदम पर आह भरते ;
तेरी हर आखोँ की शरारत पर पैसे लुटाते ....
ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते!!!!
तेरी नज़मो की नुमाइश सारेआम करते ;
तेरी तालियों की गडगडाहट में चेन से सो जाते ....
तुजे पलक जपकते आसमां पर बेटा देते;
और अगले ही पल ज़मीन पर गिरा देते ....
ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते !!!
हर रोज़ तेरे कोठे पर आते, हर रोज़ तुझ से इश्क लड़ाते ....
तेरे हर थिरकते कदम पर आह भरते ;
तेरी हर आखोँ की शरारत पर पैसे लुटाते ....
ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते!!!!
तेरी नज़मो की नुमाइश सारेआम करते ;
तेरी तालियों की गडगडाहट में चेन से सो जाते ....
तुजे पलक जपकते आसमां पर बेटा देते;
और अगले ही पल ज़मीन पर गिरा देते ....
ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते !!!