Monday, 3 June 2013

ज़िदगी : इक महफ़िल

ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते ;
हर रोज़ तेरे कोठे पर आते, हर रोज़ तुझ से इश्क लड़ाते  ....

तेरे हर थिरकते कदम पर आह भरते ;
तेरी हर आखोँ की शरारत पर पैसे लुटाते ....

 ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते!!!!

तेरी नज़मो की नुमाइश सारेआम करते ;
तेरी तालियों की गडगडाहट में चेन से सो जाते ....

तुजे पलक जपकते आसमां पर बेटा देते;
और अगले ही पल ज़मीन पर गिरा देते ....

ज़िदगी इक ग़ज़ल होती तो हम रोज़ महफ़िल जमाते !!!

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