रास्तो का इन्हे, शायद कुछ पता नहीं
मंजिल की तस्वीर, आँखों में अभी दुन्धली है
मगर चल पड़े है........
आगे ही बदना हो जैसे
मुश्किल कोई साथी हो जैसे
क्या चाहत है, क्या नहीं
शायद अभी कुछ पता नहीं
अहिस्ता अहिस्ता चलते है, राहो में कभी
मगर चल पड़े है........
रुक जाते है कभी, थक कर ये
थोडा आराम करने को
और फिर बढ़ जाते है, ये कदम
कुछ और आगे चलने को
काटें थे उस मोड़ पर, मगर फिर भी
चल पड़े है........
कल की जैसे, फिकर न हो
जो बीत गया, उस से शायद कुछ सिखा न हो
आज के लिए, यकीन है खुद पर
संभाल लेंगे, हो कैसी भी मुसीबत
डर है थोडा रास्तो में
मगर फिर भी
चल पड़े है........
1 comment:
a great piece of poem.......manguu...keep it up...
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